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अकबर की मृत्यु के समय का भारत॑

0 मम लक ईंव्ह्यूं एच० मोरलेंड सो८ एस० भाई० सी० आई० ई०, भारतीय सिविल सेवा के भूतपूर्व सदस्य

दि मैंकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिसिटेंड नई दिल्‍ली बंबई कलकत्ता मद्रास समस्त विश्व में सहयोगी कंपनियां

(9 भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद अनुवाद : सुधाकिरण सिनहा प्रथम हिंदी संस्करण : १५6७6

“इंडिया ऐट दि डेथ आफ अकवर' का प्रथम हिंदी रुपांतर

भारत सरकार से सियायती दर पर प्राप्त कागज इस पुस्तक में इस्तेमाल किया गया है॥

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद हारा प्रवर्तित

एस० जी० वसानी द्वारा दिमैकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिमिटेड के लिए प्रकाशित तथा यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्‍ली 0007 में झृद्धित |

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भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की ओर से

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अनेक उद्देश्यों में एक है शोध की उपलब्धियों को उस पाठक वर्ग तक पहुंचाना जो हमसे यह अपेक्षा रखता है कि हम भारतीय भाषाओं में इतिहास संबंधी रचनाएं तैयार तथा प्रकाशित करें। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीय इतिहासविद अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पहुंच सकते हैं, नाम और प्रतिष्ठा अजित कर सकते हैं, कितु भारतीय पाठकवर्ग का एक छोटा अंश ही इससे लाभ उठा पाता है। शिक्षण और अनुसंधान के माध्यम के रूप में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग की प्रवृत्ति वल पकड़ रही है ऐसी स्थिति में इतिहास की स्तरीय पुस्तकों की कमी गंभीर रूप से अनुभव की जा रही है। सबसे पहले हमें भारतीय इतिहास की ओर ध्यान देना है। अत: भा० इ० अ० प० ने कुछ गौरवग्रंथों (कलासिकंस) तथा इतिहास विपयक शोध की निर्दोष पद्धतियों पर आद्धुत बौर इतिहास की समकालीन प्रवृत्तियों को प्रति- विवित करने वाली कुछ अन्य पुस्तकों का अनुवाद कराने का निश्चय किया है। इस पुस्तक में सत्नहवीं शताब्दी के प्रारंभ के भारत के भाथिक जीवन का खाका खींचने का प्रयत्न किया गया है। ब्रिटिश पूर्व भारत के विषय में अतिशयोवितिपूर्ण विवरणों द्वारा जो भ्रामक राय कायम हो गई थी, 'संज्यात्मक' भांकड़ों के प्रयोग द्वारा भोरलैंड मे उसे एक 'शोधक' (करेक्टिव) प्रदान किया। यध्वपि वाद में हुए शोध ने उन्हें कई स्थलों पर गंतत सिद्ध किया हैं तथा, इंडियन सिविल सर्विस के आदमी होने के नाते उनका रवैया ब्रिटेन के प्रति स्वाभाविक रुप से पक्षपातपृर्ण था तथापि कतर्दृष्टियों सें परिपूर्ण मोरलैंड का यह कार्य अपनी तरह का महत्वपूर्ण, पथप्रदर्शक साहसिक कार्य है। पुस्तक का प्रकाशन पटना यूनिट के प्रयासों का परिणाम है जिसके लिए अनुवादक श्री सुधाकरण सिनहा; डा० नरेंद्र प्रसाद वर्मा तथा अच्य सभी सहयोगियों को हम धस्य- बाद का ज्ञापन करते हैं रामशरण शर्मा 5 भा 906 अध्यक्ष नई दिल्‍ली भारतीय इतिहास अनुसंधान परिपद

अस्तावना

इस पुस्तक का उद्देश्य सत्तहत्रीं सदी के आरंभ के भारत के आथिक जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत करना है, यह वह काल था जिसके शीघ्र बाद भारत में उत नई शक्तियों का उदय हुआ जो भागे देश के विक्रास को उत्तरोत्तर अधिकाधिक और अंत में सबसे प्रमुख रुप से प्रभावित करने वाली थीं। इतिहास में एक य्रुग की समाप्ति और दूसरे की शुरुआत तत्वत: क्रमिक संक्रमण का परिणाम होती है, फिर भी यदि भारत के संदर्भ में मध्ययुग भर आधु निक युय को अलग करने वाली समय रेखा सूचित करने की छूट दी जाए तो हम कह सकते हूँ कि वह समय रेखा सन 608 थी, जब हेक्टर' नामक अंग्रेजी जहाज सूरत पहुंचा | इस वर्ष ते आरंभ करके अगले तीन सौ सालों का आर्थिक इतिहास पहले तो विदेशी यात्रियों के वृतांतों और ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारंभिक पत्तों के संग्रहों भौर फिर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध परवर्ती काल के सरकारी अभिलेखों और प्रकाशनों के सहारे गढ़ा जा सकता है, गरज यह कि हमारे अध्ययन केंद्रों और विश्व- विद्यालयों में अध्ययन के लिए एक सुनिश्चित काल उपलब्ध है, वशर्ते कि इस दिशा में ठीक शुरवात कर दी जाए इस पुस्तक में अकवर के जासन के अंतिम वर्षों की आशिक स्थिति का विवरण प्रस्तुत करके ऐसी ही शुरुआत करने की कोशिश की गई है। मुन्ने लगता है कि इसके पूर्व वर्ती काल के ऐसे ही अध्ययन के लिए पर्याप्त सामग्री जायद कभी भी नहीं मिल पाएगी, लेकिन सोलहवीं सदी के अंतिम वर्षो के संबंध में हमें जितनी जानकारी है बह इस प्रयत्न की सा्थकता के लिए पर्याप्त जान पड़ती है।

इस प्रयत्न में सफलता मिली है था नहीं, इसका निर्णय तो पाठक ही करेंगे। मैंने जिस सामग्री का उपभोग किया है वह मुझे भारत के आशिक जीवन की मुख्य धाराओं के सुगंगत विवरण के लिए ठीक आधार प्रस्तुत करती प्रतीत होती है, लेकिन मैं यह दावा नहीं करता कि बह इस विपय का निर्णयात्मक विवरण है। यह कोई अंतिम रूप से सजा संवरा चित्त नहीं है, वस एक मोटी रूपरेखा है। कतिपय स्रोतों के गहन अध्ययन की काफी गुंजाइश है और ऐसी संभावना भी है कि जिन त्रोतों तक अभी मैं पहुंच नहीं पाया हूं उनके अवगराहन से अतिरिक्त तथ्य सामने आएं। ऐसे ज्ञोतों के कुछ नमूने पुरतंगाली प्रथासन और जेस्विट मिशनरियों के अभिलेख तथा पूर्व, दक्षिण और पश्चिमी की देशी भाषाओं के साहित्य हैं, इस प्रकार इस काल पर और शोध की व्यापक सं भावना है और इस भावी शोध में से अधिकांश ऐसी होगी जो आज भारतीय विश्वविद्यालयों में अ्णास्त्र के उभरते अध्ययन केंद्रों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त होगी वैसे इस अध्ययन के स्लोतों का जब तक अधिक सम्यक रूप से अवगराहन ने कर लिया जाए तव तक इस कृति के प्रकाशन को रोक रखने के पक्ष में दी गई दलीलों में काफी जोर है, लेकिन मुझे.लगता है कि जब तक ये अव्ययन केंद्र इस दिशा में काम शुरू नही कर देते तब तक के उपयोग के निर्मित्त इस विपय की एक मोटी रूपरेखा पेश कर देना शायद

है 8

अधिक लाभदायक रहेगा। यह कम से कम उस ढांचे का काम तो करेगी ही जिसमें भावी शोध की उपलब्धियों को सजाया जा सकेगा इसके अतिरिक्त यह उन विपयों की अलु- ऋरमणिका के काम भी आएगी जिनके संबंध में और जानकारी अपेक्षित है इस पुस्तक के पीछे जो दृष्टिकोण काम करता रहा है उसके संबंध में दो शब्द कह देना आवश्यक है। मैंने उन पाठकों को दृष्टि में रखकर लिखने की कोशिश की है जिन्‍्हें भारत की हरण की परिस्थिति का सामान्य ज्ञान है। इसके अलावा मैंने बतीत को वर्तमान के शीश से देखते की कोशिश की है। चतंमान से मेरा मतलब 90 से 94 के बीच के समय से है, जिसके वाद प्रथम विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप आशिक क्षेत्र में सहसा भारी उथल-पुथल मचाने वाली घटनाएं हो गई। लेकिन कोई तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना बहुत कठिन है, क्योंकि पूर्ववर्ती काल का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण किया गया है। भारत की अद्भुत क्षमताओं ने पश्चिमी देशों के यात्रियों की कल्पनाशविंत को गतिमान कर दिया और फलतः सोलहूवी सदी की अलंकृत भाषा मे उन्होंने जो कुछ लिखा उससे प्रयुक्त चिशेपणों को यदि हम वही महत्व दें जो आज देते है तो उस युग का बहुत आ्रामक चित्र हमारे सामने आएगा, इस दोप के मार्जन का एकमान्न संभव उपाय यही है कि हम परिमाणों और मात्राओं पर अपना ध्याव केंद्रित रखें, और इस पुस्तक में आद्योपत्रि मैं इसी कोशिश मे रहा हू कि आर्थिक जीवनधारा का निर्माण करने वाले विभिन्‍न तत्वों की संख्या और मात्रा की दृष्ठि से मुल्यांकत करूँ। इस तरह के राज- नीतिक गणित मे भूल के जो खतरे समाए हुए है उन्हें वही लोग अच्छी तरह जानते होंगे जिन्होंने इसका प्रयोग करके देखा होगा और मैं इतना आशावादी नही हूं कि अपने को इस प्रकार की भूल से वच गया मान लू। ऐसे मृल्याकन का आचित्य यह है कि इससे पाठकों को अतीत को उसके सही परिप्रेक्ष्य मे अधिक निकट से देखने मे मदद मिल सकती है, और यद्यपि यहू हो सकता है कि ऐसे मूल्याकत तत्वो से मेल खाए, किन्तु वे आमतौर पर विचाराघीन परिमाणो की अधिकता या न्यूनता का संकेत देगे और कम से कम इस विषय के एक ऐसे पहलू की ओर तो ध्यान दिलाएगे कि जिसकी इस काल पर लिखने वाले लोकप्रिय लेखक प्रायः पुर्ण उपेक्षा करते आए है मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि इन मूल्याकनों को तथ्यों के आसपास पहुचने का प्रथम प्रयास माना जाए और जिन पाठकों को वे असभव श्रतीत हो वे मूल स्नोतो का अध्ययन करके उन्हें परखें। लेकिन जो लोग मेरे इस निवेदत को स्वीकार कर सकते है उन्हे यदि मैं एक छोटी सी चेतावनी दूं तो यह भन्ुचित होगा। इस कार्य के अध्ययन में सामने आने वाली एक कृछिताई यह है कि सामग्री के जिन स्रोतों का उपयोग किया गया है वे कई भाषाओं मे हैं। मैने अग्नेजी, फ्रासीसी, लेटिन, फारसी और पुर्तगाली भाषाओं मे उनका अध्ययन किया है और पाया है कि जहा अनुवाद उपलब्ध हु वहां उचका उपयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए | जहा साधारण प्रयोजनो के लिए वे बहुत सही हो सकते है बही यह भी संभव है कि वे शब्दों के तकनीकी अर्थ देने मे चूक गए हों, जबकि अर्थशास्त्नियों के लिए यही अर्थ विशेप महत्व रखते है और अजब नही कि मानक शब्दकोपों में भी शब्दों के वे अर्थ दिए गए हो जिन अर्थों में सोलहवी सदी के लेखकों ने उनका प्रयोग किया इसलिए अच्छा यह होगा कि जहा संभव हो वहां मूल पाठ को देखा जाए भौर अगर इतालवी, स्पेनी और रूसी यात्तियों के वृतान्तों के संदर्भ में मैं स्वयं ही मूल ख्ोतों * का अध्ययन कर पाया हूं तो मैं सिर्फ यही निवेदन कर सकता हूं कि मैं इत भाषाओं से

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अनभिज्ञ हूं। अनुवादों के बारे में मैंने जो कुछ कहा है वह खासतौर से 'आईन-ए-अकबर' के अंग्रेजी अनुवाद पर लागू होता है। अनुवाद में वहुत से शब्दों की तकनीकी भर्थवत्ता तिरोहित हो गई है और मुझे लगता है कि कम से कम फिलहाल तो इस काल के अध्ययन के लिए फारसी का कुछ ज्ञान आवश्यक माना जाना चाहिए।

जिस विषय का मैंने विवेचन किया है वह काफी व्यापक है और उसके लिए किसी हंद तक साहित्य और विज्ञान के अपरिचित क्षेक्ञों का भी अवगाहन करना पड़ा है। मैंने जिन लोगों से भी अनुरोध किया, प्रायः सबने हादिक सहयोग दिया | इस सहायता के लिए यहां उन सभी मित्रों और अपरिचितों के प्रति आभार प्रकट करना मेरा कर्तव्य है। लंदन स्कूल आफ इकनामिक्स की श्रीमती सी० एम० नोल्स, किऊ के सट डेविड प्रेन और डा० स्टाफ ब्रिटिश संग्रहालय के डा० वारनेठ, मर्टन कालेज (भावसफोडड) के श्री पी० एस० एलेन, नौसनिक वास्तुविदों के संस्थान के सेक्रेटरी श्री आर० डब्ह्यू डाना, मंतचेस्टर के श्री जे० एच० डिकिसन और मनचेस्टर व्यापार मंडल के भारतीय विभाग के अवतनिक सेक्रेटरी श्री एफ० लाउडर मेरे धन्यवाद के पात्न हैं, जिस सेवा का मैं सदस्य था (और प्रसंगवश बता दूं कि जिसके विषय में कभी कभी यह कहा जाता है कि उस सेवा की अध्ययन और शोध में अब कोई रुचि नहीं रह गई है) उस सेवा के निम्नलिखित भूतपूर्व और वर्तमान सदस्यों का भी मैं आभारी हूं, पर जाज॑ पग्रियर्सन, सर एडवर्ड मैकलेगन, श्री विसेंट स्मिथ, श्री आर० सेवेल, श्री एम० सोंगवर्ष डेम्स, श्री आर० वर्न, श्री ए० सी० चटर्जी और श्री ए० यूसुफ अली। इसके अतिरिक्त भारतीय व्यापार आयुक्त श्री डी० टी० चैंडविक ने जिस तत्परता से मुझे अपने ज्ञान का लाभ दिया उसके लिए मैं उनका क्वृतज्ञ हूं और अंत में भारत कार्यालय (इंडिया आफिस) के श्री डव्ह्यू फास्टर जिस प्रकार वरावर क्षपालु रहे उसके लिए मैं उनके प्रति आभार प्रकट करता हूं

अनुक्रम

. देश और लोग देश; जनसंख्या: आवादी के वर्ग 2. प्रशासन 25

प्रशासन का स्वरूप; च्याय व्यवस्था; नगरों में सुरक्षा की स्थिति; गांवों में सुरक्षा की स्थिति; चुंगी और गमनशुल्क; उद्योग व्यापार पर प्रभाव; माप,

तौल और सिक्के |

3. उपभोक्ता वर्ग 5] दरवार और शाही अमले; अन्य सरकारी नौकरियां; पेशेवर और धामिक वर्ग ; नौकर चाकर और गुलाम

4, कृषि-उत्पादन 78

भूमि संबंधी अधिकार; क्ृपि प्रणाली; किसान और मजदूर; क्षपि के स्थानीय पहुलू; कृषि को प्रभावित करने वाला परिवेश; गांवों का जीवन

5. गेर कृषि-उत्पादन ]5 सामान्य स्थिति; जंगल भौर मछलीगाह; खानें और खनिज पदार्थ; कृषि संबंधित शिल्पकार्य, आम दस्तकारियां; परिवहन साधनों का उत्पादन; वस्त्र उद्योग- रेशम, ऊन और वाल; सूती उद्योग--सन, पट्सन और कपास; ओऔद्योगिक संगठन; शहरी मजदूरी

6. व्यापार 63 सामान्य विशेषताएं; मुख्य भारतीय समुद्री बंदरगाह; भारतीय समुद्रों के मुख्य विदेशी बंदरगाह; व्यापार मार्ग और भू-सीमा; यूरोप के साथ प्रत्यक्ष व्यापार; विदेशी व्यापार का परिमाण; तटीय एवं आंतरिक व्यापार; भारतीय व्यापार का संगठन

» जीवन स्तर 23 [. विपय प्रवेश; !. उच्चतर वर्ग; ता. मध्यवित्त वर्ग; !५. निम्न वर्गो की स्थिति; भोजन, वस्त्र तथा अन्य विवरण

जज

8. भारत की संपत्ति 236 समकालीन धारणाएं; आधुनिक धारणाएं; वितरण; उपसंहार | परिशिप्ट 25]

अनुक्रमणी 265

देश और लोग

द्श

इस पुस्तक में अकवर के शासन काल की समाप्ति के समय की भारतीय ग्र्थव्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत करने का मैं प्रयत्त कर रहा हूं अर्थात यह दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ कि लोग अपनी आमदनी को कैसे खर्च करते थे श्रौर उनकी श्रामदनी के स्रोत क्या थे इसके लिए सबसे पहले इंडिया (भारत) गब्द की परिभाषा करता आवश्यक है क्योंकि इस शब्द का सदा वही मतलब नहीं रहा है जो झ्ाज है। मध्य युग में यदि कोई साधारण यूरोपीय इंडिया या इंडीज के विषय में कभी सोचता भी था ती मोटे तौर पर यही सोचता था कि सीरिया के पश्चिम में स्थित कोई ऐसा क्षेत्र है जहां से हमें तरह-तरह की कोमती चीजें और खास कर खाना बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले मसाले प्राप्त होते हैं भौगोलिक खोजों की प्रगति के साथ-साथ कालांतर में इंडीज को पूर्व और पश्चिम के दो आएं प्रें दंट। माना जाने लग और धीरे-धीरे इंडिया (शर्त) शब्द का प्रयो (कम से कम अंग्रेजी भाषा में) सिर्फ पूर्व वाले हिस्से के लिए होने लगा। इस हिस्से में आमतौर पर फारस की खाड़ी से मलय प्रायद्वीप तक के कैत्र शामिल समझे जाते थे | भूगोलवेत्ताओं ने आगे इस क्षेत्र को और भी कई हिस्सों में विभाजित कर दिया आम तौर पर सिधु और गंगा के मुहानों को विभाजक विंदु माता गया। इस तरह जो भाग बने उनमें से एक वह भी था जिसके लिए सोलहवीं सदी के कुछ लेखकों ने अंग्रेजी के सेकेंड (द्वितीय) इंडिया या मिडल (मध्य) इंडिया शब्द का प्रयोग किया है। ग्रतएव इस मध्य भारत या द्वितीय भारत से मोटे तौर पर उसी क्षेत्र का बोध होता है जिसे आज हम भारत कहते हैं, लेकिन पुर्तगालियों और उनके तत्वावधान में देश की यात्रा करने वाले कुछ भ्रन्य देशों के लोगों ने इस शब्द का प्रयोग अत्यंत संकुचित अर्थ में किया। उनके लिए भारत का मतलव मुख्यतः पश्चिमी तट श्र उसके ठीक पीछे का कुछ क्षेत्र था। फलत: हमें सिंध से इंडिया (भारत) और इंडिया (भारत) से बंगाल की यात्रात्रों के वृत्तांत देखने को मिलते है इसलिए इस श्रेणी के लेखकों के मन में बैठे सही अर्थ को समझने के लिए हमें सावधानी से काम लेना होगा इस पुस्तक में मैं भारत शब्द का प्रयोग उसके झ्राधुनिक और परिचित अर्थ में कर रहा हूं भारत शब्द से समुद्र से लेकर हिमालय पर्वतमाला तक फँले क्षेत्र का बोध होता है, जिसका विस्तार पश्चिम में वलूचिस्तान से और पूर्व में चटगांव के श्रासपास के इलाके से आगे नहीं जाता था। ग्राधुनिक ब्रिटिण भारतीय साम्राज्य में वर्मा भी शामिल है, लेकिन सोलहवीं सदी में उस क्षेद्र में भारत से सर्वथा स्वतंत्र अनेक राज्य थे, जिनमें से प्रत्येक एक राजा के अधीन था। अपने प्रयोजन के लिए मैंने उस क्षेत्र को विदेश माना है। भ्रस्तु इस पुस्तक का वर्ण्य विषय उस देश का आर्थिक जीवन हैं जिसकी सीमाओं

2 अकबर की मृत्यु के समय का भारत

का मैंने ऊपर संकेत दिया है या मोटे तौर पर कहूं तो इसका' संबंध देशी राज्यों सहित आधुनिक भारतीय साम्राज्य से है, जिसमें वर्मा शामिल नहीं है ।१ जिस काल के बारे में मैं लिख रहा हूं उसमें भारत का एक बड़ा हिस्सा उत्तर के मुगल साम्राज्य, दक्षिण के हिंदू शासन और दकन के मुस्लिम राज्य के अ्रधीन था। इस काल में हिंदू शासित क्षेत्रों को विजयनगर साम्राज्य की संज्ञा दी जाए तो अनुचित होगा | यह सच है कि 565 ई० में तालीकोट की लड़ाई में इस साम्राज्य की सैनिक शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई थी, लेकिन साम्राज्य का जो भी हिस्सा गेप रह गया था उस पर शासक वंश की प्रभुसत्ता कायम थी और झ्कबर की मृत्यु के कुछ समय वाद तक नरसिंग नाम से हमें इस साम्राज्य का उल्लेख मिलता है। हालांकि यह प्रभुसत्ता नाममात्र की थी और साम्राज्य के अधिकारी तथा स्थानीय शासक काफी हद तक स्वतंत्र थे और वे अपनी शक्ति बढ़ाने और अपने अधीनस्थ क्षेत्रों का' विस्तार करने में लगे रहते थे दकन के मुस्लिम राजाओं ने अभी मुगलों की अधीनता पूरी तौर पर स्वीकार नहीं की थी। भ्रकबर के शासन के अंतिम वर्षो में उनमें से एक राज्य अहमदनगर के बारे में दावा किया गया कि वह मुगल साम्राज्य का एक प्रांत है, लेकिन कुछ ही वर्षो बाद वह फिर स्वतंत्र हो गया। दूसरा राज्य था खानदेश, जो झ्रांशिक रूप से निश्चय ही मुगल साम्राज्य में जामिल किया जा चुका था। शेप तीन राज्य गोलकुंडा, बीजापुर और बीदर अलग-अलग स्वतंत्र राज्य थे मुगल साम्राज्य, जिसमें प्रायः भारत का शेप सारा हिस्सा शामिल था, तब तक तया था। 565 ई० में जब अकवर गद्दी पर बैठा उस समय आगरा, पेशावर के और आधुनिक अफगानिस्तान के मध्यवर्ती क्षेत्र में स्थित देश के कुछ हिस्सों पर उसका अधिकार था, मगर सुदृढ़ नहीं हो पाया था उसके लंबे शासन काल में जो प्रदेश जीते गए वें शासन काल की समाप्ति तक भी मुगल साम्राज्य के अभिन्न अंग नही वने थे। प्रशासन की उस समय जो स्थिति थी उसकी तुलना कभी-कभी ब्रिटिश साम्राज्य के भारतीय प्रांतों और देशी राज्यों के मिश्रित संबंधों से की जाती है, लेकिन यह तुलना ठीक नहीं है | मुगलकालीत प्रशासन का मुख्य उद्देश्य भूमि कर वसूल करना था और इस काल का प्रशासनिक आदर्श यह था कि सम्राट या उसके अमले सीधे किसानों से राजस्व की उगाही करें, लेकिन इस आदर्श पर बराबर अमल नहीं हो पाता था और साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय प्रशासन को हम उन लोगों के हाथों में देखते हैं, जिन्हें जमींदार कहा जाता रहा है। अकबर के शासन काल के लेखकों ने इस शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया है वह झ्राज से कुछ भिन्न है, लेकिन यह मानना गलत होगा कि इन जमींदारों की स्थिति आजकल के नरेशों या सरदारों की सी थी। दरअसल इस शब्द से जागीरदार या सरकारी भ्रधिकारी को छोड़ कर उन सभी वर्गों का बोध होता था जो किसानों और सम्राट के बीच आते थे चाहे वह आश्चुनिक जमींदार जैसा हो, चाहे एक सरदार या वागी; कभी-कभी तो इस शब्द से स्वतंत्र राजा का भी बोध होता था अकवर का शासन बेहद व्यावहारिक था। जो सरदार या राजा सम्नाट की अधीनता स्वीकार करके उसे उचित राजस्व देने को तैयार हो जाता था उसे अ्रपनी सत्ता कायम रखने दिया जाता था और जो ही या विद्रोही होता

. जिन प्रमाणों को श्राधार मानकर मूल पुस्तक में ववतव्य दिए गए हैं उसकी सूची प्रत्पेक श्रध्याय के ब्ंत में दे दी गई है।

देश झौर लोग

था उसे मार डाला जाता था अथवा कैद कर दिया जाता था या अपने क्षेत्र से भगा दिया जाता था और उसका इलाका सम्राट के नियंत्रण में ले लिया जाता था। इसलिए जमीं- दारों का होना अपने आप में: किसी निश्चित संवधानिक व्यवस्था का चोतक नहीं है हमें गंगा के मैदान में भी जमींदारों के श्रस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं, यद्यपि इस क्षेत्र में अकवर की सत्ता भली भांति प्रतिष्ठित थी ! इसी तरह सीमांत क्षेत्रों में भी, जहां ग्रकवर का शासन नाम मात्न को था, उनके अस्तित्व का सबूत मिलता हैं और उसके शासन काल में राजपूताना तथा इलाहाबाद और वनारस के दक्षिण में स्थित पहाड़ी प्रदेशों में भी हमें जमींदार मिलते हैं जहां मुगल प्रशासन को परिस्थिति से मजबूर होकर एक संदिग्ध स्थिति स्वीकार कर लेनी पड़ी थी इन जमींदारों का अस्तित्व हमें इस तथ्य का स्मरण दिलाता है कि मुगल साम्राज्य कोई समरूप और सुगठित इकाई नहीं था और यदि व्यक्तियों की स्थिति की विशद जानकारी हमें होती तो श्ञाम्राज्य का जो चित्र हमारे सामने श्राता उसमें शायद यह देखने को मिलता कि भूस्वामियों से लेकर छोटे-छोटे शासकों के बीच जमीन पर तरह-तरह के अ्रधिकार रखने बाली कई श्रेणियां हैं; और ये छोटे-छोटे शासक किसी किसी संधि की शर्तों के अनुसार सम्राट की अधीनता तो स्तव्रीकार करते हैं, कितु इन्हें आपस में जोड़ने वाली एक ही चीज हैं कि ये सम्राट को राजस्व या नजराना देते हैं पु इन मुख्य हिस्सों के अलावा देश भर में अनेक छोटे-छोटे राज्य बिखरे पड़े थे, जिनमें से कुछ झ्राथिक दृष्टि से बड़े महत्वपूर्ण ये। विजयनगर साम्राज्य की शक्ति अब अधिकांजत: मध्यवर्ती हिस्सों तक सीमित थी और पश्चिमी तट के आसपास की राजनीतिक स्थिति बहुत उलझी हुई थी गोझा तथा अन्ध वस्तियों में पुर्तंगालियों ने अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर ली थी। जलदस्पुओं के सरदार, जिनकी स्थिति का वर्णन आगे के एक अध्याय में किया जाएगा, किसी का प्रश्नुत्व नहीं मानते थे कालीकट का जमोरिन भी स्वाधीन था और कभी पुतंगालियों से संधि रखता था तो कभी खुली शत्नता, लेकिन जलदस्यग्नों के समदायों को छिपे तौर पर वरावर समर्थन देता रहता था पूर्वी तट पर स्थिति अपेक्षाकृत अधिक स्थिर थी, यद्यपि पृतंगालियों ने विजयनगर के कुछ क्षेत्रों पर व्यवहारत: अधिकार कर लिया था। और उत्तर में गोलकुंडा और उड़ीसा के मुगल प्रांतों के बीच हमें कुछ छोटे-छोटे हिंदू राज्यों का भ्रस्तित्व भी मिलता है। उत्तर भारत में इस समय मुगल साम्राज्य से पृथक राज्यों का अस्तित्व आमतौर पर नाममात्र को ही था। जो जमींदार मुगलों को राजस्व देता था वह स्पप्टत: पराधीन था और अगर वह अपनी प्रभुसता स्थापित करना चाहता था तो सबसे पहले राजस्व देने से या तो खुल्लमखुल्ला इनकार कर देता था या राजस्व देना बंद कर देता था लेकिन राजस्व देना बंद करने के भर भी कारण हो सकते थे, और यह संभव है कि राजपृताना, मध्य भारत और छोटा नागपुर में बहुत से सरदारों और कवीलों की स्थिति ऐसी रही हो जिसे आजकल के संवंधानिक विधिवेत्ता विध्मन ग्म्द्धि मानें वे कभी निर्धारित राजस्व अदा कर देते थे तो कभी खललमखल्ला विद्रोह कर देते थे और कभी-कभी व्यवहारत: महज इसलिए स्वतंत्र हो जानते थे कि उन्हें दवाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करना मगलों के लिए असविधाजनक होता था लेकिन यहां स्थिति का जो एक सामान्य वर्णन किया गया है उसका अपवाद ब्रह्मपुत्र की घाटी में स्थित कूच

4 अ्रकबर की मृत्यु के समय का भारत

राज्य था, जिस पर मुगलों ने कभी दावा नहीं किया | इस अ्रध्याय के आरंभ में जो मानचित्र दिया गया है उसमें मैंने इन छो5-छोटे राज्यों में से कुछ को ही दिखाथा है और बड़े-बड़े क्षेत्रों की सीमाओं को भी बहुत्त निश्चयात्मक रूप से दिखाने का प्रयत्न नहीं किया है दरम्रसल इन क्षेत्रों की सीमाएं अक्सर अस्पष्ट रहीं और कई क्षेत्रों के बारे में तो कहा जा सकता है कि सीमाएं एकदम अनिश्चित थीं एक ही क्षेत्र पर एक साथ दो पक्ष दावा करते थे और उस पर कभी एक शअपने क्षेज्ञाधिकार का प्रयोग करता था तो कभी दूसरा | मुगल साम्राज्य की सीमाओ्ों पर सरसरी तौर पर निगाह डालने से यह बात स्पष्ट हो जाएगी और उससे पाठकों को इस काल की राजनीतिक स्थिति को समझने में मदद मिलेगी अकवर के साम्राज्य के पश्चिमी भाग में आधुनिक बलूचिस्तान का कुछ हिस्सा शामिल था, लेकिन मैं जितने सत्रोतों को देख सका हूं उनमें से किसी से इस बात का कोई निश्चित संकेत नहीं मिलता कि उसके वास्त- विक क्षेत्राधिकार की पश्चिम में क्या सीमा थी। उत्तर में उसके साम्राज्य में श्रफगानिस्तान का दक्षिणी हिस्सा भी शामिल था, लेकिन यात्रियों के वृत्तांतों से पता चलता है कि सिंध के पश्चिम में स्थित पहाड़ी प्रदेश आज की ही तरह न्यूनाधिक स्वतंत्र थे और मुगल सत्ता दर्रो से होकर गुजरने वाले काफिलों को मार्ग में सुरक्षा देने के प्रयास के अ्रतिरिक्त कुछ नहीं कर पाती थी कश्मीर के दक्षिणी हिस्से पर उनके शासन की पकड़ काफी मजबूत थी और यह बात शायद दक्षिणी कुमाऊं पर भी लागू होती है, लेकिन इस पव॑तीय क्षेत्र के बहुत बड़े हिस्से पर उनका कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं था | कुमाऊं से पूवे की ओर चलें तो साम्राज्य की सीमा, कम से कम व्यवहार में ब्रह्मपुत्र की घाटी तक हिमालय के जंगलों का स्पर्श करती थी और यहां से कूच राज्य और टिपरा पहाड़ी के कबीलों के क्षेत्र से गुजरती हुई दक्षिण की शोर मुड़ जाती थी इससे आगे विभिन्न स्रोतों को देखने से श्रलग-अलग निष्कर्ष निकलते है, लेकिन इसमें वहुत कम संदेह जान पड़ता है कि चटगांव मुगल साम्राज्य से बाहर था श्र अकबर के क्षेत्राधिकार की वास्तविक सीमा मेघना का मुहाना था। साम्राज्य की सीमा- रेखा समुद्र तट का स्पर्श करती हुई मेघना से पुरी के थोड़ा दक्षिण तक चलती थी, जहां से वह पश्चिम की ओर मुड़ कर भारतीय प्रायद्वीप के आरपार बंबई तक पहुंचती थी महानदी और गोदावरी के बीच की स्थिति अस्पष्ट है। इस क्षेत्र के कुछ सरदार निश्चय ही स्वतंत्र थे, जबकि दूसरे साम्राज्य को कर देते थे यानी इस भाग की सीमा रेखा का अनुमान ही किया जा सकता है। इसके वाद यह सीमा ग्रोदावरी के साथ-साथ अहमद- नगर तक जाती थी और झञगे सूरत और बंबई के बीच समुद्र तट तक पहुंचती थी। लेकिन भारत के इस हिस्से में साम्राज्य का विस्तार जारी था और जैसा कि ऊपर बताया गया है, सबसे ताजा जीते गए क्षेत्रों को अ्रभी पूरी तरह से साम्राज्य का अंग नहीं बनाया जा सकता था सीमाओं से संबंधित अनिश्चितता, जिसके कुछ उदाहरण यहां दिए गए हैं, मुख्यतः: राजनीतिक इतिहास के लेखकों की दिलचस्पी का विपय है, और श्रभी हमें इसका जितना ज्ञान प्राप्त है उसको देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि इन सीमाओं काआशथिक दृष्टिकोण से कोई विशेष महत्व था। सोलहवी सदी के पूर्वार्ध में विजयनगर के संबंध में हमें प्रायः पूरी जानकारी प्राप्त है। दकन के गोलकुंडा और बीजापुर राज्यों के जीवन का भी कुछ ज्ञान है | मैं नहीं कह सकता कि इनमें से किसी भी राज्य का जीवन

देश, और लोग 5

अकवर के साम्राज्य में सम्मिलित क्षेत्रों के जीवन से कोई विशेष भिन्न था। प्रशासन के स्तर में स्थात और काल के अनुसार अंतर देखा जा सकता था, लेकिन प्रशासन का ढांचा सर्देत्न मूलतः एक सा था और उसके अंतर्गत लोगों के लिए जितनी अच्छी तरह रहता संभव था, रहते थे। इसलिए मैं हर क्षेत्र का वर्णन अलग से करने की कोशिश नहीं करूंगा इस काल की विशेषता विभिन्नता के बजाय एकरूपता है और उपलब्ध सामग्री का उपयोग भारत को समग्रतः लेते हुए उसकी स्थिति की एक मोटी रूपरेखा पेश करने के लिए ही किया जा सकता है अस्तु, राजनीतिक सीमाओं के विवरण को यहीं समाप्त करते हुए अब हम यह देखें कि अ्कवर की मृत्यु के समय ऊपरी तौर पर भारत की क्या स्थिति थी। मैं तो यह कहूंगा कि स्थिति बहुत कुछ वैसी ही थी जैसी श्राज है। अलवत्ता, कुछ महत्वपूर्ण अंतर ध्यान में रखने चाहिए। तब रेलमार्ग नहीं थे, पंजाब और संयुक्त प्रांत में आज नहरों का जो जाल विछा हुआ है वह भी नहीं था, और आज की तरह पक्की सड़के भी नहीं थीं, हालांकि थलयात्ना के मुख्य मार्ग भली भांति निर्धारित थे और कुछ मार्गों के दोनों ओर पेड़ लगे हुए थे और कहीं-कहीं सर।यें भी वनी हुई थीं, जिनमें यात्री और सौदागर अपेक्षाकृत निरापद रातें बिताते थे। कम से कम उत्तर भारत के कुछ मार्ग तो गाड़ियों के चलते लायक अवश्य थे और इन पर कभी-कभी वेलगाड़ियों की लंबी कतारें आगे वढ़ती देखी जा सकती थीं। लेकिन गोलकुंडा से दक्षिण कन्याकुमारी तक गाड़ियों का उपयोग लगभग नहीं होता था, और भारवाही जानवर या आदमी ही परिवहन के साधन थे नौका- चालन के लिए उपयुक्त नदियां--जैसे सिंध, गंगा और यमुना--इस काल की महत्व- पूर्ण परिवहन मार्ग थीं और इनके जरिये पूरे उत्तर भारत में भारी माल की ढुलाई बड़े पैमाने पर होती थी। बंगाल के जलमार्गों का उपयोग तब शायद आज की अपेक्षा भी अधिक होता था। श्राज की बनिस्वत जंगल तो ज्यादा थे ही, लेकिन यह वात भारत के सभी भागों पर लागू नहीं होती कुछ हिस्सों में जंगलों की अ्रधिकता थी और ऐसे हिस्सों में जिन ग्राम समूहों का उल्लेख मिलता है उनके वारे में ऐसा माना जा सकता हैं कि वे जंगलों को साफ करके वसाए गए थे, लेकिन बंगाल, गुजरात और गंगा के मैदान के ऊपरी हिस्से जैसे भ्रन्य क्षेत्रों में म्रधिकांश जमीन पर नियमित रूप से खेती होती थी शौर जंगलों का विस्तार आज से ज्यादा होते हुए भी खेती की जमीन की तुलना में कम था। उत्तर भारत की धरती के स्वरूप के संबंध में एक बात विशेष ध्यान देने योग्य है : पहाड़ों की तराइयों में उगे जंगल संयुक्त प्रांत और विहार के आज से कहीं अधिक बड़े क्षेत्रों में फैले हुए थे और जहां नियमित्त और स्थायी तौर पर खेती होती थी ऐसे क्षेत्रों की सीमा मोटे तौर पर बरेली, गोरखपुर और मुजफ्फरपुर से कुछ उत्तर की ओर एक रेखा खींच कर दिखाई जा सकती है। जंगल थे, तो अनिवार्यतः उनमें हिंस्र पशु भी होंगे गंगा और यमुना के दक्षिण में स्थित पहाड़ी क्षेत्रों में हाथियों के झुंडों का सामना हो जाना आम बात थी मालदा प्रदेश में सिहों का शिकार किया जा सकता था। गोगरा में गैंडे पाए जाते थे और गंगा के मैदानी इलाके में कभी- कभी शेरों का शिकार किया जाता था | राजधानी आगरा के पास और शायद अन्य प्रशासनिक केंद्रों के आ्रासपास भी विस्तृत शिकारगाहों की व्यवस्था थी जहांगीर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उसके शिकारगाह में कुरंग जाति के हिरणों की संख्या इतनी अधिक हो गई थी कि वे खेतों में चले आते थे, लेकिन उन्हें कोई किसी प्रकार

6 अ्रकवर की मृत्यु के समय का भारत

से नुकसान नहीं पहुंचा सकता था

आबाद क्षेत्रों की सामान्य अवस्था बहुत कुछ झाज की सी ही रही होगी खेतों में आमतौर पर वाड़ नहीं लगी होती थी। तत्कालीन अंग्रेज यात्ती इसे चेंपियन लैड' कहने थे जो फसलें श्राज उगाई जाती हैं और जो पेड़ आज लगाए जाते हैं उन्हें, कुछ मामूली श्रपवादों को छोड़ कर, तव भी देखा जा सकता था। और फसलों तथा पेड़ों के अलावा उस काल की दश्यावली में कोई विशेय ध्यान देने योग्य वस्तु दिखाई नहीं देती | आज के गांवों में भी तब की तुलना में शायद वहत कम परिवर्तन आए हैं। भ्राज बंगाल तथा देश के कुछ अन्य भागों में लोड़े की चद्दरों की जो छतें देखने को मिलती हैं वे तो उन दिनों नहीं थी, लेकिन मिट्टी या खप्पनियों की दीवारों, खपड़ैल की छतों या फूस के छप्परों से बने घर सर्वत्र देखे जा सकते थे इस काल के जिन यूरोपियनों को इन घरों में ग्रस्थायी तौर पर आातिथ्य स्वीकार करने का अवसर मिला उन्होंने इनमें स्थान और फर्नीचर की कमी की शिकायत की है कस्वों और नमरों के संबंध में शायद अधिक परिवर्तन देखने को मिलें। कलकत्ता और बंबई, कानपुर और करांची सब अकवर की मृत्यु के बाद नगरों के रूप में आवाद हुए हैं, और झ्ाधुनिक मद्रास के स्थान पर तब सिर्फ मेलापुर और एस० टोम के शहरी क्षेत्र थे विजयबनगर और कन्नौज जैसे प्राचीन राज- धानी नगर पहले से ही ह्वासोन्मुख थे जौनपुर जैसे नगरों का पूर्बवर्ती महत्व भ्रभी झंणत: कायम था, और उधर सबसे नया राजधानी नगर फतहपुर सीकरी अपनी स्थापना के कुछ ही वर्ष वाद उजड़ चुका था। मुगल राजधानी आगरा, दकन राज्यों की राज- धानिया गोलकुंडा, वीजापुर, मुल॒तान और लाहौर, दिल्‍ली, इलाहाबाद, पटना, उज्जैन, अहमदाबाद, अजमेर जैसे प्रांतीय शासन केंद्र बड़े-बड़े और घनी श्रावादी वाले नगर थे यूरोपीय यात्रियों को उनमें से सबसे बड़े चगरों की तुलगा अपनी जानकारी के सबसे बड़े यूरोपीय तगरों लंदन, पेरिस या कुस्तुंतुनिया से करने में कोई झिझक नहीं होती थी इन भारतीय नगरों में आमतौर पर श्राज की तरह आवास क्षेत्र' श्रलग ही होते थे उनके घरों के बाहर सामान्यतः काफी बड़े बगीचे होते थे, लेकिन परिवार चार- दीवारियों के भ्रंदर ही रहते थे और कारोबार के स्थान भी भीतर ही हुश्ना करते थे इनमें से कुछ घर तो वहुत बड़े और आरामदेह होते थे, हालांकि बाहर से देखने में वे ऐसा श्राभास नहीं देते थे फादर मान्सरेट, जिसने सूरत से श्रागरा तक की यात्रा की थी श्र लाहौर से होते हुए काबुल तक की यात्रा में अकवर के कारवां के साथ था. जो कुछ देखा उसका निचोड़ इन शब्दों में दिया है: "(भारत के) नगर दूर से आकर्षक दीखते हैं, लेकिन अंदर पहुंचने पर जब तंग गलियां और रेलेपेल करती भीड़ पर नजर जाती है तो उनकी सारी भव्यता खत्म हो जाती है। घरों में खिड़कियां नहीं हैं। अ्रमीरों के घरों की चारदीवारियों के अंदर वगीचे, तालाव और फव्वारे होते हैं, लेकिन बाहुर से आंखों को भश्रच्छी लगने वाली कोई दीज दिखाई नहीं देती आम लोग झोंपडिियों में रहते हैं एक नगर को देख लेने का मतलब है सबको देख लेना ।' यह वर्णन मूलतः आज के भी उन नगरों पर लागू होता है, जिन्हें नगर योजना विशेषज्ञों ने नहीं संबारा है या जिनमें आंग्ल-भारतीय पद्धति पर आवास क्षेत्रों का विकास नहीं किया गया है

यहां दो शब्द भारत के पड़ोसियों के बारे में भी कहे जा सकते हैं। पश्चिम में 'फारस इन दिनों एक शक्तिमाली राज्य था, लेकिन तुर्कों से उसकी लड़ाई थी, वयोंकि तुर्क दक्षिण और पूर्व की शोर अपने क्षेत्रों का विस्तार कर रहे थे और अरव सागर के तट

देश और लोग

तक उनका प्रभुत्व कायम हो चुका था। पश्चिमोत्तर में बुखारा राज्य था, जिसके फारस की तरह भारत से अच्छे संबंध थे तत्कालीन तिब्बत के बारे में अस्पणष्ट किस्से- कहानियों के अलावा कुछ जानकारी नहीं मिलती वैसे बंगाल और चीन के बीच एक कारवां मार्ग का भी प्रमाण मिलता है, लेकिन इस काल में उसके वास्तविक उपयोग का कोई सबूत मुझे नहीं मिलता और आगरा से चीन जाने वाले यात्रियों को काबुल होकर मध्य एशिया के मुख्य पूर्वी-पश्चिमी मार्ग से जाने की सलाह दी जाती थी | बंगाल के पूर्व में भ्रराकान और दक्षिण-पूर्वे में पेगू राज्य थे, जो आधुनिक वर्मा के अधिकांश क्षेत्रों में फैले हुए थे। लगातार कई विनाशकारी लड़ाइयों के कारण पेगू इन दिनों उजड़ सा' गया था, लेकिन अ्राकान समृद्ध था, और उसके राजा का वर्णन मुगलों के बाद सबसे शक्तिशाली राजा के रूप में किया जाता था (जिसमें कुछ अतिशयोक्ति भी हो सकती है), बसे स्थल मार्ग से अराकान और भारत के बीच का यातायात नहीं के वरावर था। गरज यह कि फारस और बुखारा को छोड़ कर अन्य देशों के साथ भारत के संपर्क का साधन स्थल मार्ग की बजाय जल मार्ग था और चुंकि इस संपर्क का संबंध मुख्यतः व्यापार से था, इसलिए उसका वर्णन तद्विपयक अध्याय में करना अ्रधिक समीचीन होगा !

जनसंख्या

कहने की जरूरत नहीं कि सोलहवीं और सत्हवीं सदी में भारत की जनसंख्या की जानकारी देने वाला कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है मैंने ऐसा कोई दस्तावेज नहीं पढ़ा है जिसे किसी भी अर्थ में भारत के किसी हिस्से की जनगणना से संबंधित कहा जा सके। हमारी जानकारी के स्रोत मुख्यतः व्यक्तिगत तुलनात्मक तखमीने हैं। इनमें भारी भूलों की गुंजाइश है। इसी काल के यूरोप के संबंध में इस तरह के जो तखमीने लगाए गए, उनमें जितनी गलतियों की संभावना है, उनसे कहीं अधिक गलतियां भारत के संदर्भ में संभावित हैं। भारतीय वृत्त लेखकों के लेखन से इस प्रश्न पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता, क्योंकि उनके पास तुलना का कोई मापदंड नहीं था। देश के विभिन्न भागों की आबादी के तुलनात्मक घनत्व के संबंध में थोड़ी बहुत जानकारी के अलावा उनसे और किसी बात का पता नहीं चलता उनसे मैंने जिस प्रकार के तथ्य प्राप्त किए हैं उसका ठीक नमूना एक किवदंती है, जिसका उल्लेख सतहवीं सदी के उत्तराध के इतिहासकार एम० डे० फारिया वाई सूजा ने किया है। उसके अ्रनुसार, : 'इन मूर्तिपुजकों का कहना है कि ईश्वर ने पांच राज्यों को ये वरदान दिए---बंगाल को असंख्य पांव, ओरिक्सा को हाथी, विसनगर को ढाल-तलवार के प्रयोग में कुशल लोग, दिल्ली को बहुत से शहर और कू को असंख्य घोड़े ।---यूरोपीय यात्रियों के कथनों से कुछ और जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है, वशतें कि हम तुलना के उस मापदंड का पता लगा सकें जो उनके मन में था। यहू मापदंड किसी हृद तक अ्रनिश्चित ही होगा, क्योंकि जनगणना का चलन अभी यूरोप में भी नहीं हो पाया था, और परवर्ती अध्येताओं ने जनसंख्या के बारे में जो अनुमान लगाए हैं वे आपस में मेल नहीं खाते यह कहना शायद किसी हद तक ठीक होगा कि जिस काल के वारे में मैं लिख रहा हूं उस काल में फ्रांस की आबादी श्राज

की तुलना में लगभग आधी थी और इंग्लैंड की तो शायद आठवां हिस्सा,ही रही होगी

अगर यह मान लिया जाए कि कुल मिला कर पश्चिमी यूरोप की स्थिति इन दो दूरबर्ती

सीमाओं के बीच की थी तो हमें मोटे तौर पर इस बात का अंदाजा मिल जाता है कि

8 अकबर की मृत्यु के समय का भारत

यूरोपीय यात्री जब पूर्वी देशों के बारे में कहते हैं कि अमुक स्थान की आवादी घनी है या अमुक की विरल है तव उनका आशय क्या होता है। उत्की बातों का मतलब यह नहीं होता कि भारत की आबादी आज के यूरोप के मापदंड से देखने पर अधिक या कम थी, वल्कि यह होता है कि उस समय के यूरोप की तुलना में कम या ज्यादा थी जब उसकी* आबादी आज की अपेक्षा आधी से तो निश्चय ही वहुत कम थी इस मापदंड से देखें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि कम से कम दो सदियों तक विजयनगर क्षेव॒ की ग्रावादी बहुत घनी थी। सन 400 के शीघ्र बाद लिखते हुए कोन्‍्टी कहता है : लोगों की संख्या इतनी अधिक है कि विश्वास नहीं होता ।' लगभग उसी काल में फारस के विजयनगर स्थित राजदूत अव्दुर॑ज्जाक ने लिखा कि साम्राज्य की आवादी इतती अधिक है कि उसका अंदाजा लगा पाना असंभव है उसके एक सदी वाद पाइस से लिखा कि नग्रों, कस्वों और गांवों से भरा यह पूरा देश बहुत ही घना आवाद है 540 में श्रकाल पड़ा, जिसकी विभीषिका कोरोमंडल तट पर सबसे प्रवल रूप से प्रकट हुई उस अ्रकाल के वाद जनसंख्या में अस्थाई तौर पर कुछ कमी अवश्य आई होगी, लेकिन अगले साठ वर्षों तक मुझे ऐसी किसी और विपत्ति का कोई प्रमाण नहीं मिला है श्रौर 597 के आसपास जेंसुइट मिशनरियों के कथनों से प्रकट होता है कि जो वर्णन पाइस ने किया वह तब भी लागू होता था मन्नार के मोत्ती मछलीगाह में लगभग 60,000 की भीड़ का उल्लेख मिलता है, और पिमेंटा और साइमन सा के विवरण से प्रकट होता है कि वह अनेक शहरों वाला और सब जगह आबादी से भरा पूरा देश था। जहां तक पश्चिमी घाटों के नीचे के तंग भूभाग का संबंध है, यह भानन। पड़ेगा कि वहां की आबादी भी बहुत घनी थी, क्योंकि डिकाडास में जिन तथ्यों का उल्लेख है उनसे यही निष्कर्ष निकलता है और यूरोपीय लेखकों में से बारबोसा इसकी पुष्टि करता है दकन के राज्यों के संबंध में इस काल से सीधा संबंध रखने वाले बहुत कम तथ्य उपलब्ध हैं पंद्रहवीं सदी के रूसी भिक्षु निकितिन ने छोटे-छोटे शहरों की संख्या के बारे में लिखा है और कहा है (वशर्ते कि अनुवाद सही माना जाए ) कि देश लोगों से ठसाठस भरा हुआ है ।! सोलहवीं सदी के दौरान ये राज्य विजयनगर के खिलाफ जम कर लोहा लेते रहे और अंत में इसमें इन्हें सफलता भी मिली इन लड़ाइयों के लिए अपनी सेनाओं में इन्हें बहुत से सिपाहियों को भरती करना पड़ता होगा, जो तभी संभव था जब हम यह मान लें कि इनकी आबादी बहुत बड़ी रही होगी। अकबर की मृत्यु के आ्राधी सदी वाद फ्रांसीसी यात्री थेवनों ने श्ौरंगावाद से गोलकुंडा तक घनी आवादी' देखी, लेकिन गोलकुंडा से पूर्व मछलीपट्ूटम तक आवादी काफी विरल थी। टैवर्नियर की दकन यात्नाओं के वृतांतों से आवादी के घनेपन का आ्राभास मिलता है, और हीरे की खानों के क्षेत्रों में भीड़ का उसने जो वर्णन किया है उससे प्रकढ होता है कि देश के इस हिस्से में मजदूरों की कमी नहीं थी जहां तक मुगल साम्राज्य का संवंध है, कुछ मार्गों पर थात्रा करने वाले लोगों ने प्रसंगवश जो वातें कही हैं उनमें से अनेक आपस में मेल खाती हैं सूरत से श्रागरा तक की यात्ा के वृतांत को देखें तो पाते हैं कि गुजरात घनी आबादी वाला क्षेत्र था सूरत के विपय में लिखते हुए डेला वेल कहता है : भारत के हर क्षेत्र के भली भांति आवाद नगरों और स्थानों की तरह इसकी आावादी भी वहुत श्रधिक है इसके लेखक

देश और लोग

ने इंडिया शब्द का प्रयोग उस सीमित अर्थ में किया है जिस अर्थ में पुर्तंगाली किया करते थे लेकिन उसकी बातें गुजरात और पश्चिमी तट पर भी लागू होती हैं सूरत से बुरहानपुर की यात्रा में फिच ने एक नगर, सात बड़े कस्बों और अन्य कस्बों का उल्लेख किया है उसके वृतांत से भी घनी आबादी वाले क्षेत्रों का श्राभास मिलता है बुरहानपुर से उत्तर ग्वालियर तक आबादी विरल थी, मालवा के कुछ हिस्से वस्तुत: पूरी तरह से श्रावाद थे, लेकिन पठार -के उत्तर और दक्षिण के क्षेत्रों का अधिकांश भाग प्राय: उजाड़ था राजपूताना से होकर गुजरने वाले दूसरे मार्ग के इर्द-गिर्द कम से कम अजमेर तक की आबादी विरल थी, और यात्रियों को देश के इस हिस्से में कोई विशेष उल्लेखनीय बात दिखाई नहीं दी लेकिन आगरा से लाहौर तक का रास्ता बहुत घने आवाद क्षेत्रों में से होकर गुजरता था और यही वात लाहौर से मुल्तान तक तथा सिंधु नदी के किनारे भक्कर तक के प्रदेशों पर लागू होती है, कितु भक्कर के आगे सिंध का भ्रधिकतर भाग रेगिस्तान था यहां भी रेगिस्तान के आरपार अजमेर से तत्ता तक एक और रास्ता था, लेकिन जैसी कि अपेक्षा की जा सकती थो, इस रास्ते के आसपास के क्षेत्र भी या तो उजाड़ थे या वहां सिर्फ खानावदोश लोग रहते थे आगरा से पूर्व की शोर जाने वाले रास्तों के बारे में हमें बहुत कम जानकारी प्राप्त है। फिच ने कन्नौज और लखनऊ से होते हुए जौनपुर तक की यात्रा का वर्णन किया है, लेकिन वह देश की अवस्था का कोई विशेष विवरण नहीं देता | कितु यह जरूर बताता है कि जौनपुर से इलाहाबाद तक का रास्ता लगातार जंगलों से होकर गुजरता था ) इस तथ्य के महत्व पर हम आगे विचार करेंगे। इससे कुछ वर्ष पूर्व फिच ने नदी मार्ग से आगरा से बंगाल तक की यात्रा की थी | इस यावा के वृतांत में वह बत्ताता है कि इलाहाबाद से पटना तक का क्षेत्ञ काफी जनसंकुल था, लेकिन यह बात केवल नदियों के तट्वर्ती क्षेत्रों पर ही लागू होती है, और मुझे विहार तथा आध्चुनिक संयुक्त प्रांत के पूर्वी इलाकों का कोई और विवरण उपलब्ध नहीं हुआ है इस तरह हमें देश के विभिन्न भागों की आवादी के तुलनात्मक घनत्व का एक मोटा अंदाजा मिलता है। हम कह सकते हैं कि समकालीन यूरोप को मापदंड मानकर देखें ती बंगाल, पश्चिमोत्तर मैदान, गुजरात और दक्षिण भारत की आबादी घवनी या बहुत घनी थी जहां तक वड़े-बड़े नगरों का संबंध है हम अपने अनुमान को तथ्यों के कुछ और निकट ले जा सकते हैं। यात्रियों ने भारतीय नगरों की तुलना अपनी जानकारी के श्रन्य नगरों से की है यद्यपि और ऐसी तुलनाओं में भी भूल की वहुत गुंजाइश है, लेकिन इसी कारण इनकी स्वथा उपेक्षा नहीं की जा सकती हम एक आधुनिक उदाहरण लें श्राज के किसी ऐसे यात्री से, जिसके पास आंकड़े नहीं हैं, हम यह आशा नहीं कर सकते कि वह उत्तर भारत के नगरों की विशालता का अंतर बता सके उसे लाहौर और दिल्‍ली, आगरा और लखनऊ लगभग एक आकार के प्रतीत होंगे दूसरी ओर एक साधारण समझ वाला आदमी यह लक्ष्य करने में सहीं चूकेगा कि आबादी की दृष्टि से वे सबके सव कलकत्ता या बंबई से वहुत छोटे हैं और जालंधर या सहारनपुर से बड़े हैं। इसलिए हम पूर्ववर्ती काल के यात्रियों के बारे में भी यह मान सकते हैं कि नगरों के पारस्परिक अंतर से संवंधित उनके कथनों में भी कुछ ऐसी ही यथार्थता हो सकती है। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि भारत के बड़े नगरों को उन्होंने पश्चिम के बड़े नगरों की कोटि का ही माना है। जौडन का कहना है कि आगरा संसार के सबसे

0 अ्रकवर की मृत्यु के समय का भारत

बड़े नगरों में से था कोरियट के अनुसार, आगरा कुस्तुंतुनिया से बड़ा था, लेकिन वह लाहौर जितना बड़ा नहीं था पाइस का कहना है विजयनगर रोम जितना बड़ा था बनियर (विचाराधीन काल के किचित बाद) कहता है कि दिल्‍ली पेरिस से कोई विशेष छोटा नहीं था और झागरा दिल्‍ली से बड़ा था। राल्फ फिच का कहना है कि भ्रागरा और फतहपुर सीकरी लंदन से बड़े थे मान्सरेट के मुताबिक लाहौर यूरोप या एशिया के किसी भी नगर से छोटा नहीं था। अन्य यात्रियों ने भी ऐसी ही तुलनाएं पेश की हैं। मगर इस काल के यूरोपीय नगरों की आवादियों की भी ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त